तेल चुक रहा है दीपों का,
अब मैं ज्योति कहां से लाऊं।
स्वाति की अब चाह नहीं है,
चातक बन मैं क्यों चिल्लाऊं।
बना स्वयं ही केंद्र बिंदु हूं,
कड़वे घूंट ही पीते जाऊं।
अरमानों के कांधों पर अब,
अपनी मिट्टी स्वयं उठाऊं।
चातक बन मैं क्यों चिल्लाऊं।
दुनिया बड़ी निराली यारो,
इंद्रधनुष सतरंगी है।
बेरंगों का मोल नहीं है,
अब मैं दाम कहां से लाऊं।
चातक बन मैं क्यों चिल्लाऊं।
बगिया से हरियाली रूठी,
ठूंठ दिख रहे तरूवर के।
ऋतु बसंत की आस नहीं अब,
मैं मधुमास कहां से लाऊं।
चातक बन मैं क्यों चिल्लाऊं।
रंग-बिरंगी जगमग महफिल,
सजती हैं दरबारों में।
अब दरबारी रहा नहीं मैं,
व्यथा वेदना किसे सुनाऊं।
तेल चुक रहा है दीपों का,
अब मैं ज्योति कहां से लाऊं।
स्वाति की अब चाह नहीं है,
चातक बन मैं क्यों चिल्लाऊं।
चातक बन मैं क्यों चिल्लाऊं।
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